Wednesday, December 13, 2017

सार छंद

औरों की खुशियों में (सार या ललित छंद )
सुनीता काम्बोज

(चित्र गूगल से साभार )


एक बार गर गई, लौटकर,आती नहीं जवानी
माटी में माटी मिल जाए,
फिर पानी में पानी ।
सबको इक दिन जाना होगा,जो दुनिया में आया
हँसकर रोकर 
हर मानव ने,जीवन का सुर गाया ।
ज्ञानी है कोई इस जग में, है कोई पाखण्डी
कोई सरल बड़ा ही मिलता,कोई बड़ा घमण्डी ।
इस दुनिया में कुछ लोगों को ,अपना आप सुहाता
जो उनकी अच्छाई गिनता ,केवल वो ही भाता ।
रंग- बिरंगे सजे खिलौने ,दुनिया लगती मेला
कोई जीता भीड़- भाड़ में,कोई रहा अकेला ।
सारा जीवन धन के पीछे ,फिरते हैं बौराए
जितना मिलता कम पड़ता है, हाय हाय! चिल्लाए ।
औरों की खुशियों में खुशियाँ , जिसने ढूँढी ,पाई
रहता नहीं कभी वह प्यासा, मिट जाती तन्हाई ।
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